: 2024 Olympic Games से पहले फ़्रांस की राष्ट्रीय समस्या बनी खटमल!
Tue, Oct 3, 2023
पेरिस
विश्व के तमाम मुल्कों की तरह France के सामने भी चुनौतियों का पहाड़ है. 2024 में फ़्रांस Olympic Games की मेजबानी कर रहा है. लेकिन जो ऊर्जा उसे इस बेशकीमती इवेंट को यादगार बनाने के लिए खर्च करनी चाहिए वो मीटिंग और प्लानिंग में खर्च हो रही है. जी हां सही सुना आपने. फ़्रांस की परेशानी की वजह, न तो कोई दुश्मन मुल्क है. न ही कोई बिगड़ा घुसपैठिया. मुल्क की चिंता का कारण है 'खटमलों' का आतंक. सरकार के सामने बड़ा सवाल ये है कि खटमलों ने अगर अन्य देशों से आए खिलाड़ियों को अपने राडार पर ले लिया तो क्या होगा?
दरअसल फ़्रांस खटमलों की समस्या से जूझ रहा है, सरकार ने चेतावनी दी है कि उसे पेरिस में होने वाले ओलंपिक खेलों से पहले इन कीटों से हर हाल में छुटकारा पाना होगा. रिपोर्टों पर यकीन करें तो, पेरिस खटमलों के इस आतंक से सबसे ज्यादा प्रभावित है. जैसे हालात हैं, पिछले कुछ वर्षों में खटमल पूरे फ़्रांस के लिए एक राष्ट्रीय समस्या बन गए हैं. चाहे वो घर और अस्पताल हों या सिनेमाघर और ट्रेनें हर जगह खटमल हैं.
खटमलों की बढ़ती आबादी ने फ़्रांस में परिवहन मंत्री के भी कान खड़े कर दिए हैं. जिन्होंने अब ये ठान लिया है कि, चाहे कुछ भी हो जाए वो अब हर हाल में यात्रियों को सुरक्षा मुहैया कराएंगे. परिवहन मंत्री क्लेमेंट ब्यून ने माइक्रो ब्लॉगिंग साइट X पर ट्वीट किया और कई जरूरी बातें की हैं. साथ ही उन्होंने ये भी कहा है कि इस खतरे से निपटने के लिए ट्रांसपोर्ट ऑपरेटर्स को जागरूक भी किया जाएगा.
ध्यान रहे परिवहन मंत्री का ये X पोस्ट उस पत्र के बाद आया है जिसे पेरिस के पहले डिप्टी मेयर इमैनुएल ग्रेगोइरे द्वारा लिखा गया था. पत्र में ग्रेगोइरे ने प्रधानमंत्री एलिजाबेथ बोर्न से 'संकट; पर कार्रवाई करने का आह्वान किया था. चूंकि खटमल इस समय पूरे फ़्रांस के लिए एक सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या बन गए हैं तमाम लोग इसी बात को दोहरा रहे हैं कि किसी भी हाल में इनका खात्मा किया जाना चाहिए.
तमाम राजनेताओं का मामले पर तर्क यही है कि चूंकि फ्रांस 2024 में ओलंपिक और पैरालंपिक खेलों की मेजबानी के लिए तैयार है इसलिए राज्य को इस संकट से निपटने के लिए उपयुक्त कार्य योजना बनाने के लिए तत्काल सभी संबंधित पक्षों को एक साथ लाना चाहिए.
राजधानी पेरिस में खटमलों की समस्या सरकार के सामने कितनी बड़ी चुनौती है? इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अब खटमलों के खिलाफ उपचार को बीमा में कवर किये जाने की बात भी हो रही है. ध्यान रहे सोशल मीडिया पर ऐसे तमाम पोस्ट आ रहे हैं जिनमें लोग बता रहे हैं कि अस्पताल और सिनेमाघरों तक में उन्हें खटमलों द्वारा काटा जा रहा है.
बताते चलें कि अभी बीत दिनों ही यूजीसी सिनेमाज ने एक Xपोस्ट के बाद अपने ग्राहकों से माफ़ी मांगी थी और कहा था कि वो इस मामले को गंभीरता से लेते हुए इमरजेंसी प्रक्रिया लागू करने वाली है. बहरहाल इस मामले में जो तर्क फ़्रांस के ऊर्जा संक्रमण मंत्रालय ने अपनी वेबसाइट पर दिए हैं वो किसी को पच नहीं रहे हैं. मंत्रालय ने खटमलों की बढ़ती हुई आबादी के लिए अंतरराष्ट्रीय यात्रा और कीटनाशकों के प्रति प्रतिरोध को जिम्मेदार ठहराया है.
: कनाडा में भी PoK चला रहा आजादी का जबरदस्त आंदोलन
Mon, Oct 2, 2023
नई दिल्ली
खालिस्तान आंदोलन और खालिस्तानी आतंकियों का लंबे समय से कनाडा समर्थन करता रहा है। ये खालिस्तानी भारत के पंजाब समेत कुछ और राज्यों को मिलाकर एक अलग देश खालिस्तान की मांग कर रहे हैं। हालांकि, ये आंदोलन 1980 के दशक में खत्म हो चुका है लेकिन अब नए सिरे से कुछ सालों में कनाडा में बसे खालिस्तान समर्थकों ने उसे हवा देने की कोशिश की है। खालिस्तानी कनाडा में अपनी मांग के समर्थन में जनमत संग्रह भी करवाते रहे हैं। ठीक इसी तरह का एक जबरदस्त आंदोलन का सामना कनाडा खुद कर रहा है।
क्या है क्यूबेक आंदोलन
कनाडा 10 प्रांतों और तीन टेरिटरी को मिलाकर बना है। कनाडा का सबसे बड़ा प्रांत क्यूबेक है। इसी क्यूबेक में लंबे समय से आजादी की मांग की जा रही है और वहां तेज आंदोलन चल रहा है। वैसे तो क्यूबेक 1867 से ही कनाडा का एक प्रांत रहा है लेकिन आर्थिक, सामाजिक, भाषाई और सांस्कृतिक विविधता के आधार पर वह एक अलग संप्रभु देश की मांग करता रहा है। इसे कनाडा का PoK कहा जाता है। जहां पाकिस्तान से आजाद होने के लिए चल रहे आंदोलन की ही तरह कनाडा से आजादी के लिए उग्र विरोध-प्रदर्शन चल रहा है।
कनाडा के हाउस ऑफ कॉमन्स में क्यूबेक 78 सांसद चुनकर भेजता है, जो किसी राज्य के मामले में दूसरा नंबर है। कनाडा की सत्तारूढ़ लिबरल पार्टी के पास इस प्रांत से 35 सांसद हैं, ब्लॉक क्यूबेकॉइस- क्यूबेक की संप्रभुता के लिए लड़ने वाला एक राजनीतिक दल है, जिसके इस प्रांत से 32 निर्वाचित सांसद हैं।
भारत ने रख दी दुखती रग पर हाथ
कनाडा से क्यूबेक के अलग होने के लिए यहां दो बार जनमत संग्रह हो चुका है। पहला जनमत संग्रह 1980 के दौरान हुआ। इसमें कनाडा के 10 प्रातों में से केवल चार प्रांत ही क्यूबेक के समर्थन में आए। बाकी छह प्रांतो ने क्यूबेक को बड़ा झटका देते हुए उसके सपनों पर पानी फेर दिया। दूसरा जनमत संग्रह 1995 में हुआ, जिसमें कनाडा दो फाड़ होते-होते बच गया। क्यूबेक की आजादी के समर्थन में कुल 49.4 फीसदी लोगों ने वोट किए, जबकि इसके विरोध में 50.6 फीसदी लोगों ने वोट किए। मात्र 54000 वोटों की वदह से क्यूबेक को आजादी नहीं मिल सकी। दो बार जनमत संग्रह के बावजूद कनाडा ने इस मुद्दे पर चुप्पी साध रखी है लेकिन भारत ने अब उसकी इस दुखती रग पर हाथ रख दिया है। खालिस्तानी आतंकी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या के बाद उपजे विवाद और तल्ख रिश्तों के बीच भारत में अब क्यूबेक को समर्थन देने और उस आंदोलन के लिए अपनी जमीन का इस्तेमाल करने देने की मांग होने लगी है। केंद्र की सत्ताधारी पार्टी बीजेपी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बैजयंत पांडा ने पिछले दिनों कहा कि जब कनाडा ने खालिस्तान समर्थकों के विचार को बढ़ाने के लिए अपनी धरती का इस्तेमाल करने की इजाजत दी है तो हमें भी क्यूबेक की आजादी के आंदोलन को सुविधाजनक बनाने के लिए अपनी धरती की पेशकश करनी चाहिए।
ट्रूडो को छूट रहे पसीने
बीजेपी नेता की इस मांग से कनाडाई प्रधानमंत्री को सांप सूंघ गया है। जस्टिन ट्रूडो के पसीने छूट रहे हैं क्योंकि कनाडा को पता है कि अगर भारत ने क्यूबेक की आजादी का समर्थन कर दिया तो उसे लेने के देने पड़ सकते हैं। जिस वक्त ये दोनों देश आपसी रिश्तों में तल्खी, बेरुखेपन और तनानतनी का सामना कर रहे हैं, ठीक उसी वक्त क्यूबेक में आजादी के आंदोलनकारियों ने अपना आंदोलन और उग्र कर दिया है। जस्टिन ट्रूडो बीजेपी नेता के बयान से बेचैन हो उठे हैं।
आजादी की मांग क्यों?
दरअसल, कनाडा 150 सालों तक फ्रांस का उपनिवेश रहा है। 1760 में ब्रिटेन ने कनाडा पर हमला किया। इसके बाद कनाडा दो हिस्सों में बंट गया। एक ऊपरी कनाडा और दूसरा निचला कनाडा। अपर कनाडा पर ब्रिटेन ने कब्जा कर लिया, जबकि लोअर कनाडा पर फ्रांस का कब्जा बरकरार रहा। यही लोअर कनाडा आज क्यूबेक के नाम से जाना जाता है। ब्रिटेन ने 1867 में कनाडा को सत्ता सौंप दी। 1867 के संविधान अधिनियम के तहत 1 जुलाई, 1867 को कनाडा के चार प्रांतों ओंटारियो, क्यूबेक, नोवा स्कोटिया, और नई ब्रंसविक की आधिकारिक तौर पर घोषणा की गई लेकिन कनाडा को पूरी तरह से स्वतंत्रता 17 अप्रैल 1982 को मिली। इस तरह क्यूबेक पर लंबे समय तक फ्रांसीसी प्रभुत्व रहा। वहां की 90 फीसदी आबादी फ्रेंच बोलती है और सामाजिक-सांस्कृतिक रूप से अपने को फ्रेंच समझती है। यही वजह है कि वह अलग संप्रभु देश के रूप में अपनी पहचान चाहते हैं। क्यूबेक के लोगों का ये भी आरोप है कि ट्रूडो की सरकार क्यूबेक के साथ भेदभावपूर्ण रवैया अपनाती है। आरोप है कि ट्रूडो सरकार क्यूबेक के लोगों को न तो अच्छी सैलरी देते हैं और न ही अन्य सुविधाएं, जो अन्य कनाडाई नागरिकों को मिलते हैं। ये ठीक वैसी ही स्थिति है, जैसी पाक अधिकृत कश्मीर में है।
: 'भट्टी' होती तो जाग जाते विक्रम और रोवर!
Mon, Oct 2, 2023
बेंगलुरु.
भारतीय स्पेस एजेंसी इसरो का बनाया चंद्रयान-3 इस वक्त चांद के दक्षिणि ध्रुव पर मजबूती से खड़ा है। लैंडिंग के शुरुआती 14 दिन तो यान के विक्रम लैंडर और रोवर पूरी ताकत के साथ चांद पर खोजबीन में जुटे रहे लेकिन, रात के बाद अब जब सवेरा हो चुका है, विक्रम और रोवर निष्क्रिय पड़े हैं। हालांकि इसरो के वैज्ञानिकों का दावा है कि उनकी कोशिश अंधेरा होने तक जारी रहेगी। आशंका है कि रोवर के उपकरण रात की -200 डिग्री वाली ठंड में काम करना बंद कर चुके हैं। पूरी दुनिया इस वक्त विक्रम और रोवर के जागने का इंतजार कर रहे हैं ताकि वे एक बार फिर चांद पर घूमे और जीवन की तलाश में नई खोज करते रहें। अब ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या यान के साथ 'भट्टी' साथ भेजी जाती तो विक्रम और रोवर जाग जाते! इससे पहले नासा और रूसी एजेंसी रोस्कोस्मोस भी इसका इस्तेमाल कर चुके हैं। 22 सितंबर को चांद पर सूर्योदय के बाद से इसरो की टीम लगातार विक्रम और रोवर को जगाने की कोशिश कर रही है। लेकिन, समय के साथ रोवर के फिर सक्रिय होने की उम्मीद धूमिल होती जा रही है। सवाल यह है क्या अगर 'भट्टी' को यान के साथ भेजा जाता तो रोवर काम करने लगता! हम जिस 'भट्टी' की बात कर रहे हैं, उसे रोडियोआइसोटोप थर्मो इलेक्ट्रिक जनरेटर या आरटीजी कहते हैं। चलिए जानते हैं यह क्या उपकरण है और किस तरह इस्तेमाल किया जाता है, इसके फायदे क्या हैं? रूस ने 1970 में पहले चंद्र मिशन में इसका इस्तेमाल किया था। जिसकी बदौलत 10 महीने तक उनका रोवर काम करता रहा।
क्या है रेडियो आइसोटोप हीटर
रेडियोआइसोटोप हीटर यूनिट एक छोटा उपकरण होता है जिसे अंतरिक्ष यान के अंदर फिट करके मिशन में भेजा जाता है। यह रेडियोधर्मी उपकरण अंतरिक्ष में उपकरणों को गर्मी देता है। ये छोटे रेडियोआइसोटोप थर्मोइलेक्ट्रिक जेनरेटर (आरटीजी) के समान हैं। इसके एक उपकरण से कई दशकों तक उपकरण को गर्मी दी जा सकती है। इसके एक किलो प्लूटोनियम से 80 लाख किलोवाट बिजली पैदा की जा सकती है। आरटीजी में कोई चलायमान हिस्सा नहीं होता, इसलिए इसमें सर्विसिंग की जरूरत नहीं होती। अंतरिक्ष यान में, आरएचयू का उपयोग अंतरिक्ष, किसी और ग्रह या उपग्रह पर उपकरण को गर्मी देने के लिए किया जाता है। यह अंतरिक्ष यान के अन्य हिस्सों के तापमान से बहुत भिन्न हो सकता है। अंतरिक्ष के वातारण में यान का कोई भी हिस्सा जिस पर सीधी धूप नहीं पड़ती, वह इतना ठंडा हो जाता है कि इलेक्ट्रॉनिक्स या नाजुक वैज्ञानिक उपकरण टूटने का खतरा हो, तब ये इलेक्ट्रिक हीटर उन्हें गर्म रखने के अन्य तरीकों की तुलना में सरल और अधिक विश्वसनीय माने जाते हैं।
नासा, रूस और चीन भी कर चुके इस्तेमाल
रेडियोआइसोटोप थर्मोइलेक्ट्रिक जनरेटर यानी आरटीजी वह उपकरण है, जिसका इस्तेमाल अमेरिका की नासा और रूस की अंतरिक्ष एजेंसी कई बार कर चुकी हैं। अमेरिकी अंतरिक्ष मिशनों पर उपयोग किए जाने वाले रेडियोआइसोटोप थर्मोइलेक्ट्रिक जनरेटर (आरटीजी) का एक विशिष्ट डिजाइन है। नासा जीपीएचएस-आरटीजी का इस्तेमाल यूलिसिस (1), गैलीलियो (2), कैसिनी-ह्यूजेंस (3), और न्यू होराइजन्स (1) मिशन पर कर चुका है। रूस की रोस्कोस्मोस अंतरिक्ष एजेंसी रोस्कोस्मोस 17 नवंबर 1970 को चांद पर रोवर उतारने वाला पहला देश बना था। लूना-1 नाम इस अंतरिक्ष यान ने 10 महीने में चांद की सतह पर 10 किलोमीटर की यात्रा तय की। चांद पर क्योंकि धरती के 14 दिनों के बराबर रात होती है और उस दौरान चांद का तापमान -200 डिग्री तक चला जाता है। ऐसे में रात के वक्त उपकरणों के खराब होने का खतरा रहता है। ऐसे में रूस ने पोलोनियम रोडियोआइसोटोप हीटर की मदद से रोवर को गर्म रखा। चीन ने भी 2013 में चांगई-3 लैंडर और युतु रोवर भेजा था। उसमें भी हीटर डिवाइस लगाई थी।