: अपने हो रहे नाराज, हमास का नहीं मिल रहा सटीक इलाज
Sun, Jan 21, 2024
यरुशलम.
हमास के खिलाफ युद्ध के बीच इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के सामने दोहरी चुनौती आ गई है। एक तरफ बंधकों की रिहाई न होने से अपनों में नाराजगी बढ़ने लगी है। वहीं, दूसरी तरफ हाल-फिलहाल हमास के खिलाफ युद्ध खत्म होने के आसार भी नजर नहीं आ रहे हैं। यानी वह हमास का इलाज ढूंढ पाने में अभी तक नाकाम है। इन सबसे बीच हमास द्वारा बंधक बनाए गए लोगों के परिजनों का गुस्सा लगातार बढ़ता जा रहा है।
गुस्साए परिजनों ने शनिवार को इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के घर के बाहर प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों का कहना है नेतन्याहू सरकार हमास द्वारा बंधक बनाए गए सैकड़ों इजरायलियों को छुड़ाने के लिए कोई प्रयास नहीं कर रही है। वहीं, गाजा में युद्ध लंबा खिंचता चला जा रहा है। गौरतलब है कि 7 अक्टूबर को हमास के हमले के साथ शुरू हुए इस युद्ध में दोनों पक्षों से अभी तक बड़ी संख्या में लोग मारे जा चुके हैं।
बंधकों के परिवारों के एक समूह ने कहा कि हम लोग 105 दिनों से रहम की भीख मांग रहे हैं। अब हम सरकार से मांग करते हैं कि बंधकों को छुड़ाने के लिए निर्णायक कदम उठाए जाएं। इस बीच इजरायल वॉर कैबिनेट के एक सदस्य ने कहा है कि बंधकों को छुड़ाने का एकमात्र रास्ता सीजफायर है। इस टिप्पणी के चलते इजरायल की वर्तमान रणनीति की काफी आलोचना हो रही है। हमास और इजरायल के बीच युद्ध को चार महीने हो चुके हैं। जिस तरह से प्रधानमंत्री नेतन्याहू के घर के बाहर प्रदर्शन हुआ है और इजरायली आर्मी के पूर्व मुखिया गादी आइसेनकेट ने जिस तरह टिप्पणी की है, वह दिखाता है कि युद्ध को लेकर इजरायल के भीतर सबकुछ ठीक नहीं है।
दोहरा दबाव
गौरतलब है हमास के खिलाफ युद्ध को लेकर इजरायल सरकार को परस्पर विरोधी दबावों का सामना करना पड़ रहा है। एक तरफ तो वह युद्ध तेज करके अपने दक्षिणपंथी सहयोगियों को खुश करना चाहता है। वहीं, दूसरी तरफ नेतन्याहू के ऊपर कुछ अन्य दबाव भी हैं। इसमें अमेरिका से लेकर बंधकों के परिवार तक का दबाव शामिल है। इन सभी को डर है कि युद्ध लंबा खिंचने की सूरत में कहीं बंधकों की जान खतरे में न पड़ जाए। गौरतलब है कि इजरायली नेतृत्व का कहना है कि वह हमास के खिलाफ पूर्ण जीत तक लड़ाई जारी रखेगा। हालांकि उसने यह नहीं स्पष्ट किया है कि इसके लिए उसकी रणनीति क्या होगी। इस बीच महिलाओं के लिए कार्य करने वाली एजेंसी 'संयुक्त राष्ट्र महिला' (यूएन वीमेन) ने बताया है कि इजराइल और गाजा के बीच जारी युद्ध में 16,000 महिलाएं और बच्चे मारे गए हैं। एजेंसी ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा कि अनुमान है कि प्रत्येक घंटे में दो माताएं दम तोड़ रही हैं। इसके मुताबिक 100 से अधिक दिन के संघर्ष के कारण कम से कम 3000 महिलाओं ने अपने पतियों को खो दिया है और कम से कम 10,000 बच्चों के सिर से पिता का साया उठ गया है। शुक्रवार को जारी रिपोर्ट में एजेंसी ने उन परेशानियों का जिक्र किया जो महिलाओं को संघर्ष वाले स्थानों को बच्चों के साथ छोड़ने के कारण उठानी पड़ती है। रिपोर्ट के अनुसार क्षेत्र की आबादी 23 लाख है। इसमें से लगभग 19 लाख लोग विस्थापित हैं, जिनमें करीब दस लाख महिलाएं और लड़कियां हैं, जिन्हें आश्रय और सुरक्षा की तलाश है।
: गणतंत्र दिवस पर तालिबानी दूत को भेजा गया निमंत्रण
Sun, Jan 21, 2024
मुंबई/नई दिल्ली.
संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) में भारतीय दूतावास ने अबू धाबी में गणतंत्र दिवस समारोह के लिए तालिबान के दूत बदरुद्दीन हक्कानी को आमंत्रित किया है। जलालुद्दीन हक्कानी के बेटों में से एक बदरुद्दीन हक्कानी को अक्टूबर 2023 में राजदूत नियुक्त किया गया था। उनके भाई सिराजुद्दीन हक्कानी अफगानिस्तान के आंतरिक मंत्री हैं। तालिबान के प्रमुख नेताओं में से एक हक्कानी नेटवर्क 2008 में काबुल में भारतीय दूतावास सहित कई आतंकी हमलों में शामिल था।
संयुक्त अरब अमीरात में भारतीय राजदूत संजय सुधीर के नाम से जारी निमंत्रण की एक प्रति अफगान पत्रकार बिलाल सरवरी ने ट्वीट की है। वह अब अफगानिस्तान से बाहर रहते हैं। इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी एक रिपोर्ट में इसकी पुष्टि की है। भारत सरकार उस समय से तालिबान के साथ उलझी हुई है जब से उसने एक तकनीकी टीम भेजी और काबुल में भारतीय दूतावास को फिर से खोला। सूत्रों ने कहा कि बदरुद्दीन हक्कानी को निमंत्रण उसी के अनुरूप है। सूत्रों ने कहा कि निमंत्रण "इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ अफगानिस्तान" के दूत को संबोधित था। तालिबान खुद को "अफगानिस्तान के इस्लामी अमीरात" के रूप में दर्शाता है। "इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ अफगानिस्तान" का प्रतिनिधित्व तत्कालीन राष्ट्रपति अशरफ गनी ने किया था। इस मुद्दे पर सावधानी से आगे बढ़ते हुए भारत काबुल में तालिबान के साथ बातचीत कर रहा है, लेकिन अभी तक तालिबान शासन को राजनयिक मान्यता नहीं दी है। मुंबई और हैदराबाद में अफगानिस्तान के महावाणिज्य दूत ने पिछले साल नवंबर में घोषणा की थी कि वे नई दिल्ली में अफगान दूतावास को खुला रखेंगे। साथ ही यह भी कहा है कि भारत स्थित अफगानी दूतावास पर इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ अफगानिस्तान का झंडा फहराया जाएगा। दूतावास तालिबान के इस्लामिक अमीरात ऑफ अफगानिस्तान के बजाय पुराने नामकरण इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ अफगानिस्तान का उपयोग करना जारी रखेगा।
ऐसा समझा जाता है कि भारत ने अपने स्टैंड से नई नेतृत्व टीम को अवगत करा दिया है। अफगान महावाणिज्यदूत ने विदेश मंत्रालय के अधिकारियों को आश्वासन दिया है कि वे इन नियमों का पालन करेंगे।
: मालदीव में एयरलिफ्ट न कर पाने से मर गया 14 साल का बच्चा
Sun, Jan 21, 2024
माले/नई दिल्ली.
मालदीव में शनिवार को 14 साल के उस बच्चे की मौत हो गई जिसे भारत ने डोर्नियर विमान से एयरलिफ्ट करने की पेशकश की थी। बताया जा रहा है कि मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू ने इसे लेकर मंजूरी देने से इनकार कर दिया। इस लड़के को ब्रेन ट्यूमर था और उसे स्ट्रोक आया था। बच्चे की हालत गंभीर होने पर उसके परिवार वालों ने उसे घर से राजधानी माले ले जाने के लिए एयर एम्बुलेंस की अपील की थी।
परिवार ने आरोप लगाया कि अधिकारी उसकी तुरंत चिकित्सा निकासी की व्यवस्था नहीं कर सके। मालदीव की मीडिया में लड़के के पिता का बयान छपा है। इसमें कहा गया, 'बेटे को स्ट्रोक आने के तुरंत बाद हमने उसे माले ले जाने के लिए आइलैंड एविएशन को फोन किया, मगर उन्होंने हमारी कॉल का जवाब नहीं दिया। उनकी ओर से गुरुवार सुबह 8:30 बजे हमारे फोन का जवाब दिया गया, जबकि ऐसे मामलों का समाधान एयर एम्बुलेंस है।' लड़के पिता ने कहा कि इमरजेंसी निकासी की अपील करने के 16 घंटे बाद उसे माले लाया गया। डॉक्टर मेरे बच्चे को नहीं बचा सके।
भारत-मालदीव के रिश्ते में चल रही तनातनी
इस बीच, पूरे मामले को लेकर आसंधा कंपनी लिमिटेड का बयान आया है जिसमें सफाई दी गई है। इसमें कहा गया कि आपातकालीन निकासी की अपील मिलने के तुरंत बाद हमने प्रक्रिया शुरू कर दी। मगर, दुर्भाग्य रहा कि अंतिम क्षण में उड़ान में तकनीकी समस्या के कारण उसे नहीं भेजा सका। ऐसे में चीजें प्लान के मुताबिक नहीं हो सकीं। बच्चे की मौत की खबर ऐसे समय सामने आई है जब भारत और मालदीव के रिश्ते में तनातनी चल रही है। दरअसल, कुछ दिनों पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लक्षद्वीप की यात्रा की थी जिसे लेकर मालदीव के कुछ मंत्रियों ने अपमानजनक टिप्पणियां कीं। हालांकि, बाद में इस बयानों से मालदीव की सरकार ने खुद को अलग कर लिया।